काल रूपी कोरोना
कोरोना वाइरस शायद कुछ वर्षो बाद किसी को या न रहे परंतु इस भयावह त्रासदी का गवाह बनी इस पीढ़ी के शायद ही ये घाव भर पाए। मै एक अध्यापक के पद पर कार्यरत हुँ। फरवरी का महिना समाप्त होने वाला था चारो तरफ माहौल बिल्कुल समान्य था। पत्र पत्रिकाओं मे कोरोना के बारे मे जानकारी मिली थी परंतु सरसरी।
अचानक एक दिन राज्य सरकार ने आदेश जारी किया की दिनांक 20 फरवरी से राज्य मे अनिश्चित काल के लिए बंद घोषित किया जाता हैं। मेरी ड्यूटी चेकपोस्ट पर रात्री 8.00बजे से प्रातः 8.00बजे तक लगाई गयी। उसी दिन रात्री 8.00बजे प्रधान मन्त्री श्री मोदी जी ने 15दिन के लोकडाउन की घोषणा कर दी। अचानक अफरताफ़री मच गयी। क्यों की आदेश ये था की जो जहाँ है वही रहे।
स्थिति भयावह हो चुकी थी। ये बीमारी जानलेवा थी। इसके फलने के तरीके इसे और भयावह बना रहे थे। विदेश मे कई राष्ट्र कब्रिस्तान का रूप ले चुके थे। लाशो का देर लोगो को लाचार बना रहा था। ऐसा आभास हो रहा था मानो यही प्रलय है।पूरा विश्व एक कैद खाने मे बदल चुका था। बाजार बैंक स्कूल सभी सरकारी कार्यालय अनिश्चित काल के लिए बंद हो चुके थे। सभी अपने घरों मे बंद थे।
लेकिन लोकड़ाउन का भयावह चेहरा चेकपोस्ट पर हमने देखा। देश की एक बड़ी आबादी किस संकट से अपने परिवार को पालती है ,अपना से बिछुड़ कर अपनो को पालना। उस रात्री लोग मृत्यु के भय से अपनो को बचाने की जुगत मे जहा जिस हाल मे थे सब कुछ छोड़कर वहा से निकल गए।
जो व्यक्ति कभी 1 किलोमीटर भी पैदल नही चला होगा वह सैकडो मिल की दूरी तय करने को तत्पर था। एक अजीब छटपटाहट और बैचेनी। रोजगार छीन चुका था, भुखमरी की नौबत, मौत का भय, अंधकार की पराकाष्ठा। शायद ऐसी स्थिति कई शताबदीयों बाद सामने आये थी।
कई किलोमीटर लंबी कतारे कोई पैदल तो कोई साईकिल पर कोई किसी अन्य साधन से भूखे प्यासे अविरल गति से एक बार अपने घर पहुँचने की जगत मे संघर्ष कर रहा था। कोई इस प्रयास मे पुलिस की सख्ती के भी शिकार हो रहे थे। कई प्रकार की जलालत सहने पर भी घर जाने की जिद लोगो को आगे बढ़ा रही थी। 


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